मैं आशुतोष, अनघ, अज, औघड़, भैरव, भोलेनाथ भूतेश्वर,
महाप्रलय कर दूं जग में या रक्षित कर दूं फिर विष पीकर?
किन्तु शमन संशय का कर दो, कितना विष फैला है अन्दर?
गंगा का भी नीर अल्प है, बैठो हो इतना फैलाकर,
मैं विवश वश में ना पाकर, कर देता ये शांत समंदर,
पर इससे तो अच्छा कर दूं महाप्रलय इस धरणी पर,